डॉलर के मुकाबले कमजोर रुपया किस पर और कैसे डालता है असर
अमेरिकी डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपया शुक्रवार को 92 के ऐतिहासिक निचले स्तर पर पहुंच गया। इसके साथ ही कच्चे तेल से लेकर इलेक्ट्रॉनिक सामान तक देश का आयात, विदेशी शिक्षा और विदेश यात्रा महंगी होने की आशंका है। इस वजह से महंगाई भी बढ़ सकती है, हालांकि इससे निर्यातकों को कुछ राहत मिलने का अनुमान है।रुपये में इस महीने अब तक अमेरिकी डॉलर के मुकाबले 202 पैसे या दो प्रतिशत से अधिक की गिरावट आई है। वर्ष 2025 में विदेशी कोषों की लगातार निकासी और डॉलर की मजबूती के कारण इसमें पांच प्रतिशत की गिरावट आई थी। गिरते रुपये का तात्कालिक प्रभाव आयातकों पर पड़ता है, जिन्हें समान मात्रा के लिए अधिक भुगतान करना होगा।
इन क्षेत्रों पर पड़ेगा इस तरह प्रभाव
आयात: भारतीय आयात में कच्चा तेल, कोयला, प्लास्टिक सामग्री, रसायन, इलेक्ट्रॉनिक सामान, वनस्पति तेल, उर्वरक, मशीनरी, सोना, मोती, कीमती और अर्ध-कीमती पत्थर तथा लोहा और इस्पात शामिल हैं। आयातित वस्तुओं के भुगतान के लिए आयातकों को अमेरिकी डॉलर खरीदने पड़ते हैं। रुपये में गिरावट के साथ, वस्तुओं का आयात महंगा हो जाएगा।विदेशी शिक्षा: अमेरिकी डॉलर के मुकाबले कमजोर रुपये का मतलब है कि विदेशी शिक्षा अधिक महंगी हो जाएगी, क्योंकि छात्रों को विदेशी संस्थानों द्वारा लिए जाने वाले प्रत्येक डॉलर के लिए अधिक रुपये देने होंगे।विदेशी यात्रा: कमजोर स्थानीय मुद्रा का मतलब है कि यात्रा खर्च के लिए एक अमेरिकी डॉलर खरीदने के लिए अधिक रुपये देने होंगे।धन भेजना: अनिवासी भारतीय (एनआरआई) जो पैसा घर भेजते हैं, वे रुपये के मूल्य में अधिक पैसा भेज सकेंगे।निर्यात: निर्यातकों को रुपये के अवमूल्यन से लाभ होने की संभावना है, क्योंकि उन्हें एक डॉलर से अधिक रुपये मिलेंगे। हालांकि, आयात पर निर्भर निर्यातकों को भारतीय मुद्रा के कमजोर होने से लाभ नहीं होगा। इस तरह देखा जाए तो कपड़ा जैसे कम आयात निर्भरता वाले क्षेत्रों को कमजोर रुपये से सबसे अधिक लाभ होना चाहिए, जबकि इलेक्ट्रॉनिक्स जैसे उच्च-आयात वाले क्षेत्रों को सबसे कम लाभ होगा।
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