हकों की मांग को लेकर आदिवासी समाज का प्रदर्शन, अधिकारियों को दिया ज्ञापन
बिलासपुर। जल, जंगल और जमीन समेत अपनी कई बुनियादी मांगों और हकों को लेकर सर्व आदिवासी समाज के बैनर तले लोग सड़कों पर उतरे। जिला मुख्यालय के समक्ष आयोजित इस विशाल प्रदर्शन में समाज के सैकड़ों पदाधिकारी और आम लोग शामिल हुए। इस दौरान उन्होंने शासन-प्रशासन के खिलाफ अपनी आवाज बुलंद की। प्रदर्शन के समापन पर एक प्रतिनिधिमंडल ने मुख्यमंत्री, राज्यपाल, शिक्षा मंत्री और संस्कृति मंत्री को संबोधित 15 सूत्रीय मांगपत्र स्थानीय प्रशासन को सौंपा।
जल, जंगल और जमीन के पारंपरिक हकों पर जोर
आंदोलनकारियों को संबोधित करते हुए समाज के प्रवक्ताओं ने कहा कि लंबे समय से आदिवासियों से जुड़े गंभीर मुद्दों की अनदेखी की जा रही है। उन्होंने जल, जंगल और जमीन पर आदिवासियों के पारंपरिक और संवैधानिक अधिकारों की रक्षा करने की पुरजोर वकालत की। नेताओं का कहना था कि समुदाय के सामाजिक, शैक्षणिक और सांस्कृतिक विकास के लिए सरकार को तत्काल कड़े और सकारात्मक कदम उठाने होंगे।
सरकारी स्कूलों में धार्मिक प्रार्थनाओं को अनिवार्य करने का विरोध
इस प्रदर्शन के दौरान समाज के पदाधिकारियों ने स्कूलों में गायत्री मंत्र, शांति मंत्र, गुरु मंत्र और सरस्वती वंदना जैसे धार्मिक अनुष्ठानों को लागू करने के निर्देशों पर कड़ा ऐतराज जताया। उन्होंने तर्क दिया कि हमारा देश एक धर्मनिरपेक्ष और विविधतापूर्ण राष्ट्र है। किसी एक विशिष्ट धार्मिक परंपरा को थोपने के बजाय सरकार को सभी समुदायों और आस्थाओं की भावनाओं का आदर करना चाहिए।
सांस्कृतिक पहचान और विरासतों के संरक्षण की अपील
आदिवासी नेताओं ने स्पष्ट किया कि उनकी अपनी एक अनूठी संस्कृति, जीवन शैली और धार्मिक मान्यताएं हैं, जिनका संरक्षण बेहद जरूरी है। उन्होंने मांग की कि प्रशासन को ऐसी नीतियां तैयार करनी चाहिए जो किसी भी वर्ग की सांस्कृतिक पहचान को ठेस न पहुँचाएं और सभी को बराबरी का दर्जा दें।
मांगें पूरी न होने पर उग्र आंदोलन की चेतावनी
घेराव और प्रदर्शन के बाद समाज के प्रतिनिधियों ने प्रशासनिक अधिकारियों को अपनी मांगों का पुलिंदा सौंपा। उन्होंने दो टूक शब्दों में चेतावनी दी कि यदि सरकार ने उनकी इन 15 सूत्रीय मांगों पर जल्द ही कोई ठोस और सकारात्मक फैसला नहीं लिया, तो आने वाले दिनों में इस जनांदोलन को पूरे प्रदेश में बड़े पैमाने पर तेज किया जाएगा।
अब सरकार के रुख का इंतजार
इस सामूहिक प्रदर्शन के बाद अब गेंद सरकार और जिला प्रशासन के पाले में है। आदिवासी समाज अब यह देख रहा है कि उनकी इन जायज मांगों पर प्रशासन क्या कदम उठाता है। समुदाय को उम्मीद है कि उनकी समस्याओं को गंभीरता से लेते हुए जल्द ही कोई उचित समाधान निकाला जाएगा।
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