इलेक्ट्रॉनिक और डिजिटल मीडिया की भूमिका जांच के दायरे में
रेणुकास्वामी मर्डर केस में कर्नाटक उच्च न्यायालय ने केंद्रीय सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय (I&B Ministry) और आईटी मंत्रालय को कड़े निर्देश जारी किए हैं। अदालत ने कन्नड़ फिल्म अभिनेता दर्शन थुगुदीपा से संबंधित टीवी प्रसारणों और डिजिटल प्लेटफॉर्म पर मौजूद सामग्री की गहनता से जांच करने के लिए कहा है। इसके साथ ही कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि यदि नियमों का उल्लंघन पाया जाता है, तो जिम्मेदार मीडिया घरानों के खिलाफ सख्त दंडात्मक कार्रवाई की जाए। मालूम हो कि अभिनेता दर्शन वर्तमान में न्यायिक हिरासत के तहत जेल में ही बंद हैं।
'अदालती कार्यवाही को सार्वजनिक तमाशा न बनाए मीडिया'
मामले की सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति सचिन शंकर मगदुम ने अपने आदेश में ब्रॉडकास्ट मीडिया के रवैये पर गहरी नाराजगी जताई। कोर्ट ने कहा कि टेलीविजन चैनलों ने अदालती कार्यवाही का हूबहू हू-ब-हू चित्रण करने की सीमा पार कर दी है। प्रसारण के दौरान सिर्फ जज का चेहरा छिपाया जाता है, जबकि आरोपियों और उनके वकीलों के चेहरे खुलेआम टीवी स्क्रीन पर दिखाए जाते हैं, जिससे पूरी न्यायिक प्रक्रिया एक सार्वजनिक तमाशा बनकर रह जाती है। लगातार चेतावनियों के बावजूद इस तरह का कृत्य सीधे तौर पर अदालत की गरिमा और उसके अधिकारों की अवहेलना है।
जांच पूरी होने तक कंटेंट स्ट्रीमिंग पर रोक लगाने का निर्देश
हाई कोर्ट ने केंद्र सरकार को निर्देश दिया है कि अभिनेता दर्शन द्वारा अपनी शिकायत में दिए गए तमाम विवादित वीडियो और डिजिटल लिंक्स की समीक्षा की जाए। यदि केबल टेलीविजन नेटवर्क नियमों या डिजिटल गाइडलाइंस का उल्लंघन साबित होता है, तो संबंधित मीडिया संस्थानों के खिलाफ तत्काल एक्शन लिया जाए। कोर्ट ने यह भी कहा कि इस मामले की जांच पूरी होने तक केस से जुड़े किसी भी प्रकार के कंटेंट के प्रसारण या ऑनलाइन स्ट्रीमिंग पर फौरन रोक लगाई जाए।
अभिनेता दर्शन ने याचिका में क्या लगाए हैं आरोप?
अभिनेता दर्शन ने इस साल की शुरुआत में 16 जनवरी को सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के समक्ष एक शिकायत दर्ज कराई थी, जिसमें उन्होंने एक हजार से अधिक यूट्यूब (YouTube) वीडियो लिंक्स का ब्योरा देते हुए आरोपी चैनलों पर कार्रवाई की मांग की थी। मंत्रालय स्तर पर कोई ठोस कदम न उठाए जाने के बाद दर्शन ने हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
दर्शन ने अपनी रिट याचिका में दलील दी कि मीडिया संस्थान वर्ष 2024 में हाई कोर्ट और बेंगलुरु की सिविल कोर्ट द्वारा पारित उन अंतरिम आदेशों का खुल्लम-खुल्ला उल्लंघन कर रहे हैं, जिसमें केस से जुड़ी संवेदनशील जानकारियों को सार्वजनिक करने पर पाबंदी लगाई गई थी। दर्शन का आरोप है कि मीडिया चैनल आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और ग्राफिक्स के जरिए घटना और अदालती प्रक्रिया का काल्पनिक रूपांतरण दिखा रहे हैं, जो कानूनन गलत है।
'मीडिया-ट्रायल लोकतंत्र और न्याय के लिए बड़ा खतरा'
कर्नाटक हाई कोर्ट की पीठ ने भारत के सुप्रीम कोर्ट के साथ-साथ अमेरिका, ब्रिटेन और फ्रांस की शीर्ष अदालतों के ऐतिहासिक फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि मीडिया की रिपोर्टिंग को कभी भी न्यायिक फैसलों की जगह लेने या अदालत के काम को प्रभावित करने की छूट नहीं दी जा सकती।
न्यायाधीश ने साफ तौर पर कहा, "वाक् और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता (Freedom of Speech) एक संवैधानिक अधिकार है, लेकिन जब यह 'मीडिया प्रेरित न्याय' (Media-driven Justice) का रूप ले लेती है, तो लोकतंत्र की रक्षक बनने के बजाय उसके लिए सबसे बड़ा खतरा बन जाती है। मीडिया की भूमिका एक सजग पहरेदार की है, लेकिन अगर वह खुद ही जज या जूरी बनने की कोशिश करेगी, तो कानून व्यवस्था चरमरा जाएगी।"
हाई कोर्ट ने केंद्र सरकार को चेतावनी भरे लहजे में कहा है कि वह इस मामले को पूरी गंभीरता से संभाले, अन्यथा अदालत को स्वयं कड़ा रुख अख्तियार करना पड़ेगा और दोषी चैनलों के प्रसारण लाइसेंस रद्द करने पर भी विचार किया जा सकता है।
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