जंगल और पहाड़ी क्षेत्र की जमीन बचाने पर हाई कोर्ट का बड़ा फैसला
बिलासपुर। छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय की वेकेशन बेंच (अवकाशकालीन पीठ) ने सरगुजा जिले के ऐतिहासिक महामाया पहाड़ और डबरीपानी आरक्षित वन क्षेत्र की भूमि पर अवैध कब्जा जमाने वालों को किसी भी तरह की अंतरिम राहत देने से साफ इनकार कर दिया है। अदालत ने बेजा कब्जाधारियों द्वारा बेदखली की प्रशासनिक कार्रवाई पर स्टे (रोक) लगाने के उद्देश्य से दायर किए गए अंतरिम आवेदन को सिरे से खारिज कर दिया। बिलासपुर हाई कोर्ट ने इस संवेदनशील मामले की गंभीरता को देखते हुए विस्तृत सुनवाई के लिए अगली तारीख 13 जुलाई मुकर्रर की है।
राजस्व और वन विभाग की बेदखली नोटिस के खिलाफ कोर्ट पहुंचे थे कब्जाधारी
गौरतलब है कि सरगुजा के संरक्षित महामाया पहाड़ और डबरीपानी रिजर्व फॉरेस्ट की सरकारी जमीन पर रशीदा खातून सहित कई अन्य लोग पिछले लंबे समय से अवैध निर्माण व पक्के मकान बनाकर रह रहे हैं। हाल ही में पर्यावरण संरक्षण और वन भूमि को बचाने के लिए राजस्व विभाग और वन विभाग ने संयुक्त कार्रवाई करते हुए इन अतिक्रमणकारियों को अंतिम बेदखली नोटिस थमाया था। प्रशासन द्वारा जारी इस कड़े नोटिस में कब्जाधारियों को स्वतः अतिक्रमण हटाने के लिए महज एक सप्ताह (7 दिन) का समय दिया गया था, जिसके खत्म होने के बाद जबरन हटाने की चेतावनी दी गई थी।
याचिकाकर्ताओं की दलील: 'बिना दस्तावेजों की जांच किए दिया गया आदेश'
प्रशासनिक अमले की इस त्वरित कार्रवाई से घबराकर याचिकाकर्ताओं के कानूनी पैरोकार (वकील) ने हाई कोर्ट में मामले की तुरंत सुनवाई (अर्जेंट हियरिंग) के लिए गुहार लगाई थी। अदालत के समक्ष दलील देते हुए याचिकाकर्ताओं ने कहा कि उन्हें बीते 17 मार्च 2026 को बेदखली का फरमान सुनाया गया है। इस नोटिस के तहत उन्हें अपनी रिहाइश हटाने के लिए सिर्फ 7 दिनों की मोहलत दी गई है और ऐसा न करने की सूरत में सरकारी महकमा पुलिस बल की सहायता से उनके आशियानों को जमींदोज करने की तैयारी में है।
कब्जाधारियों के वकील का मुख्य तर्क था कि उनके मुवक्किल पिछले 15 से 20 वर्षों से उस भूखंड पर निवास कर रहे हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि प्रभागीय वन अधिकारी (डीएफओ) ने 25 जनवरी 2025 को उनके द्वारा प्रस्तुत किए गए जरूरी राजस्व दस्तावेजों व कागजातों की बारीकी से पड़ताल किए बिना ही एकतरफा आदेश पारित कर दिया था। विभाग के उस आदेश में कहा गया था कि याचिकाकर्ता अपने दावों और पेश किए गए साक्ष्यों के आधार पर आरक्षित वन भूमि पर अपना वैध मालिकाना हक साबित करने में पूरी तरह विफल रहे हैं। हालांकि, हाई कोर्ट ने फिलहाल याचिकाकर्ताओं की इन दलीलों को अंतरिम राहत के योग्य नहीं माना है और अब सबकी निगाहें 13 जुलाई को होने वाली अगली सुनवाई पर टिकी हैं।
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