ऑस्ट्रेलिया चुनाव में बिगड़ सकता है ट्रंप का मामला: कनाडा की तरह ऑस्ट्रेलिया में भी ट्रंप की छवि पार्टी को पहुंचा सकती नुकसान
ऑस्ट्रेलिया में आम चुनाव से पहले राजनीतिक तापमान चरम पर है, लेकिन यह चुनाव विपक्षी नेता पीटर डटन के लिए नई चुनौती लेकर आया है। उनकी तुलना अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से की जाती रही है। कनाडा में हाल ही में हुए चुनाव में कंजर्वेटिव पार्टी की हार के बाद ऑस्ट्रेलिया में भी ऐसी ही आशंकाएं जताई जा रही हैं कि ट्रंप से जुड़ी छवि यहां भी कंजर्वेटिव पार्टी को नुकसान पहुंचा सकती है। इन परिस्थितियों को देखते हुए डटन अब खुद को ट्रंप से अलग साबित करने की पूरी कोशिश कर रहे हैं, लेकिन विश्लेषकों का कहना है कि उनकी कठोर और दक्षिणपंथी नीतियों के कारण मतदाता उन्हें ऑस्ट्रेलियाई ट्रंप के रूप में देखने लगे हैं। पीटर डटन इससे पहले ऑस्ट्रेलिया के गृह, रक्षा और आव्रजन मंत्री रह चुके हैं। वे अपनी कठोर नीतियों और अप्रवासी विरोधी बयानों के लिए जाने जाते हैं। उन्होंने न सिर्फ पब्लिक ब्रॉडकास्टिंग को नफरत फैलाने वाला मीडिया बताया, बल्कि 41 हजार सरकारी नौकरियां खत्म करने और वोक एजेंडा खत्म करने की बात भी कही। उनका यह अंदाज ट्रंप की राजनीति से मेल खाता है, जिसके कारण युवाओं और उदार मतदाताओं के बीच उनकी लोकप्रियता कम होती जा रही है। ऐसे में प्रधानमंत्री एंथनी अल्बानी चुनावी दौड़ में उनसे आगे नजर आ रहे हैं।
इस चुनाव में ट्रंप का कितना असर होगा
कई विश्लेषकों का मानना है कि ऑस्ट्रेलिया में ट्रंप का प्रभाव अप्रत्यक्ष रूप से चुनाव को प्रभावित कर रहा है। अमेरिका द्वारा लगाए गए वैश्विक टैरिफ, ट्रंप समर्थित उद्योगपतियों की मौजूदगी और अमेरिका के साथ बढ़ते तनाव ने मतदाताओं को यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि क्या डटन की शैली ऑस्ट्रेलिया के लिए सुरक्षित है। यहां तक कि डटन खुद अपने निर्वाचन क्षेत्र डिक्सन में कड़ी टक्कर का सामना कर रहे हैं, जहां वे सिर्फ 1.7% से आगे हैं।
इन मुद्दों पर चुनाव हो रहा है
इस चुनाव में मुख्य मुद्दा महंगाई और जीवन यापन की बढ़ती लागत है। दोनों प्रमुख पार्टियों, डटन की लिबरल पार्टी और अल्बानीज़ की लेबर पार्टी ने कर कटौती और राहत योजनाओं का वादा किया है। हालांकि, ट्रंप की तर्ज पर मेक ऑस्ट्रेलिया ग्रेट अगेन जैसे नारों के साथ डटन के अभियान ने मध्यम वर्ग के मतदाताओं को भ्रमित कर दिया है। डटन की पार्टी का ट्रंप-प्रेरित दृष्टिकोण भी अल्पसंख्यकों और युवा मतदाताओं को आकर्षित करने में विफल रहा है।
इस बार चीन से सुरक्षा कोई मुद्दा नहीं
चीन का मुद्दा भी इस चुनाव में अपेक्षाकृत शांत रहा है। पिछली बार से अलग इस बार चीन से खतरे पर ज्यादा जोर नहीं दिया गया, जबकि हाल ही में चीनी युद्धपोतों द्वारा ऑस्ट्रेलिया की परिक्रमा और लाइव फायर ड्रिल्स चर्चा में रहे। इसकी एक वजह यह भी है कि ट्रंप की नीतियों को अब चीन से भी बड़ा वैश्विक खतरा माना जा रहा है। यही वजह है कि ऑस्ट्रेलिया की सुरक्षा संधि AUKUS को लेकर सवाल उठ रहे हैं कि क्या अब अमेरिका पर भरोसा किया जा सकता है।
ऑस्ट्रेलियाई सर्वेक्षण क्या कह रहे हैं?
मतदान से ठीक पहले कई सर्वेक्षण संकेत दे रहे हैं कि अल्बानीज़ की लेबर पार्टी एक बार फिर सत्ता में लौट सकती है, हालांकि यह स्पष्ट नहीं है कि उन्हें बहुमत मिल पाएगा या नहीं। इस बार युवा मतदाता निर्णायक भूमिका निभा सकते हैं, जो मौजूदा राजनीतिक व्यवस्था से असंतुष्ट हैं और बदलाव के पक्ष में वोट कर सकते हैं। विश्लेषकों का कहना है कि डटन की हार की स्थिति में वे पूरी जिम्मेदारी ट्रंप के प्रभाव पर नहीं डाल सकते, क्योंकि उनकी पार्टी ने जनता को लुभाने के लिए कोई कारगर रणनीति नहीं अपनाई।
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