उज्जैन में रथयात्रा से पहले 'बीमार' पड़ते हैं भगवान जगन्नाथ, 15 दिन चलती है आयुर्वेदिक सेवा
मध्य प्रदेश की धर्मनगरी उज्जैन, जिसे प्राचीन काल में अवंतिका के नाम से जाना जाता था, अपनी समृद्ध धार्मिक परंपराओं और अनूठी मान्यताओं के लिए देशभर में प्रसिद्ध है. यहां मनाया जाने वाला हर उत्सव श्रद्धा और संस्कृति का अद्भुत संगम का नज़ारा देखने को मिलता है. इसी कड़ी में इस्कॉन मंदिर से निकलने वाली भगवान जगन्नाथ की भव्य रथयात्रा विशेष आकर्षण का केंद्र रहती है. इस दिव्य यात्रा से पहले एक ऐसी परंपरा निभाई जाती है, जो भक्तों को आश्चर्यचकित कर देती है. मान्यता के अनुसार रथयात्रा से पूर्व भगवान जगन्नाथ अस्वस्थ हो जाते हैं. कुछ दिनों तक विशेष सेवा एवं उपचार ग्रहण करते हैं.
इस्कॉन मंदिर के पीआरओ राघव पंडित दास बताते हैं कि रथयात्रा से पहले भगवान जगन्नाथ के एकांतवास की परंपरा विशेष महत्व रखती है. इन दिनों मंदिर के पुजारी पूरी श्रद्धा और विधि-विधान के साथ उनकी सेवा में जुटे रहते हैं. यह परंपरा भगवान श्रीकृष्ण के उस प्रसंग से जुड़ी है, जब वे स्नान उत्सव के बाद अपनी मौसी के घर ठहरने के दौरान अस्वस्थ हो गए थे. उसी कडी को जीवंत बनाए रखने के लिए आज भी भगवान को विश्राम दिया जाता है और विशेष सेवा-पूजा का आयोजन किया जाता है.
ज्वर लीला’ की अनोखी चिकित्सा
भगवान जगन्नाथ की अस्वस्थ अवस्था को धार्मिक परंपराओं में “ज्वर लीला” के नाम से जाना जाता है. इस दौरान भगवान को 15 दिनों तक विश्राम दिया जाता है और उनकी सेवा पूरी तरह आयुर्वेदिक विधि से की जाती है. उपचार के लिए विशेष जड़ी-बूटियों जो की हिमालय व अन्य जगहों से तैयार की गई “दशमूल” औषधि का उपयोग किया जाता है, जिससे काढ़ा बनाकर भगवान को अर्पित किया जाता है. इस अवधि में उनकी देखभाल ठीक उसी तरह की जाती है जैसे किसी बीमार व्यक्ति की होती है. उन्हें हल्का और तरल भोजन परोसा जाता है. विशेष सेवा और उपचार के माध्यम से उनके शीघ्र स्वास्थ्य लाभ की कामना की जाती है
रोज होती है मालिश फिर भोग मे दलिया
परंपरा के अनुसार, भगवान जगन्नाथ की ज्वर लीला केवल एक धार्मिक परंपरा नहीं, बल्कि भक्त और भगवान के अटूट संबंध का प्रतीक मानी जाती है. जब भगवान अस्वस्थ होते हैं, तब उनकी सेवा भी बिल्कुल एक सामान्य व्यक्ति की तरह की जाती है. उन्हें औषधीय तेल से मालिश दी जाती है, स्वास्थ्य की देखभाल की जाती है और शरीर की स्थिति पर विशेष ध्यान रखा जाता है. इस दौरान भगवान को हल्का भोजन जैसे खिचड़ी, दलिया और मूंग की दाल का भोग अर्पित किया जाता है. यह परंपरा संदेश देती है कि भगवान अपने भक्तों के सुख-दुख और जीवन के हर अनुभव से जुड़े हुए हैं.
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