तेल, गैस के बाद अब भारत की इंटरनेट व्यवस्था को चोट पहुंच सकता हैं मिडिल ईस्ट में जारी तनाव
नई दिल्ली। मिडिल ईस्ट में लगातार बढ़ते तनाव के बीच में एक नया खतरा सामने दिख रहा है, जिसका बहुत बड़ा असर भारत पर पड़ सकता है। दरअसल, तनाव का असर दुनिया की इंटरनेट व्यवस्था को भी पड़ सकता है। विशेषज्ञों का कहना है कि अगर स्ट्रेट ऑफ होर्मुज़ इलाके में संघर्ष बढ़ता है, तब उस इलाके के समुद्र के नीचे बिछी फाइबर-ऑप्टिक्स केबल्स को नुकसान पहुंच सकता है। ये वहीं केबल्स हैं, जिससे दुनिया का ज्यादातर इंटरनेट डेटा गुजरता है।
बात दें कि स्ट्रेट ऑफ होर्मुज़ दुनिया के सबसे अहम समुद्री रास्तों में से एक है। इस रास्ते से बड़ी मात्रा में तेल गुजरता है, लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि समुद्र की सतह के नीचे यहां से कई महत्वपूर्ण इंटरनेट केबल्स भी गुजरती हैं। ये केबल्स एशिया, पश्चिम एशिया और यूरोप को डिजिटल रूप से जोड़ती हैं। एक के अनुसार भारत से यूरोप को जोड़ने वाली कई बड़ी केबल्स इसी क्षेत्र से होकर गुजरती हैं। इसलिए यह इलाका भारत के लिए भी डिजिटल कनेक्टिविटी का बेहद अहम कॉरिडोर माना जाता है।
इंटरनेट कनेक्टिविटी को मजबूत बनाने के लिए दुनिया की बड़ी टेक कंपनियां और टेलीकॉम ऑपरेटर लगातार नए अंडरसी केबल नेटवर्क में निवेश कर रहे हैं। हाल ही में गूगल के सीईओ सुंदर पिचाई ने नई दिल्ली की यात्रा के दौरान इंडिया-अमेरिका कनेक्ट प्रोजेक्ट की घोषणा की। इसका मकसद भारत को वैश्विक डिजिटल नेटवर्क से और मजबूत तरीके से जोड़ना है।
रिपोर्ट के मुताबिक भारत का लगभग एक-तिहाई पश्चिम दिशा की इंटरनेट ट्रैफिक इन्हीं केबल्स के जरिए गुजरती है। इसका मतलब अगर इस क्षेत्र में कोई बड़ी रुकावट आती है, तब भारत और यूरोप के बीच डेटा ट्रांसमिशन प्रभावित हो सकता है। हालांकि, विशेषज्ञों का कहना है कि वैश्विक इंटरनेट नेटवर्क में बैकअप सिस्टम भी मौजूद हैं।
इस पूरे मामले से जुड़े एक जानकार ने कहा, समुद्री केबल्स में रेडंडेंसी होती है। अगर एक केबल कट भी जाए, तब डेटा दूसरे रास्तों से भेजा जा सकता है, लेकिन अगर कई केबल्स एक साथ प्रभावित हो जाएं, तब बाकी रूट्स पर ज्यादा लोड पड़ जाएगा। इसके बाद इंटरनेट की स्पीड स्लो हो सकती है और सर्विस में दिक्कतें आ सकती हैं।
उन्होंने कहा कि इसका असर तुरंत दिखाई नहीं देगा। दुनिया भर में इंटरनेट सर्वर रिजर्व में रखे जाते हैं। भारत के पास भी इसतरह के सिस्टम हैं। इस कारण कम से कम एक हफ्ते तक बड़ा असर देखने को नहीं मिलेगा। इसके अलावा अटलांटिक महासागर से आने वाले केबल्स भी विकल्प के रूप में मौजूद हैं।
एक अन्य जानकार ने कहा कि, अभी तक इंटरनेट कनेक्टिविटी पर कोई असर नहीं पड़ा है, लेकिन अगर केबल्स काट दी गईं या टेलीकॉम और पावर इंफ्रास्ट्रक्चर पर हमला हुआ, तब स्थिति गंभीर हो सकती है। विशेषज्ञों के मुताबिक भारत का अंतरराष्ट्रीय इंटरनेट ट्रैफिक मुख्य रूप से दो बड़े गेटवे से बाहर जाता है। एक मुंबई में और दूसरा चेन्नई में। मुंबई के रास्ते जाने वाला डेटा अरब सागर और खाड़ी क्षेत्र से होकर यूरोप तक पहुंचता है, इसलिए इस इलाके में किसी भी तरह की गड़बड़ी भारत के डिजिटल नेटवर्क को प्रभावित कर सकती है।
साइबर सिक्योरिटी विशेषज्ञ ने बताया कि दुनिया का इंटरनेट सैटेलाइट्स से नहीं बल्कि समुद्र के नीचे बिछी केबल्स से चलता है। उन्होंने कहा, दुनिया के 99 प्रतिशत से ज्यादा डेटा अंडरसी फाइबर-ऑप्टिक केबल्स से गुजरता है। यही डिजिटल अर्थव्यवस्था की असली रीढ़ हैं। साइबर सिक्योरिटी विशेषज्ञ के मुताबिक रेड सी और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज़ के आसपास का इलाका आज दुनिया का अहम डिजिटल हाईवे बन चुका है। अगर यहां कोई रुकावट आती है, तब इंटरनेट सर्विसेज़ स्लो हो सकती हैं और ग्लोबल कनेक्टिविटी प्रभावित हो सकती है। उन्होंने चेतावनी दी कि युद्ध की स्थिति में ये केबल्स बेहद असुरक्षित हो जाती हैं। उनके मुताबिक, अब दुनिया एक नए सीबेड इंफ्रास्ट्रक्चर वॉर की तरफ बढ़ रही है। जैसे तेल पाइपलाइन और समुद्री रास्ते रणनीतिक संपत्ति माने जाते हैं, वैसे ही अब इंटरनेट केबल्स भी वैश्विक शक्ति संतुलन का अहम हिस्सा बन गए हैं।
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