रक्तदान से जुड़े नियमों में ट्रांसजेंडर और समलैंगिकों की स्थिति क्या
रक्तदान को महादान कहा जाता है, आपकी ये छोटी सी पहल आपातकालीन स्थितियों में लोगों की जान बचाने वाली हो सकती है। गंभीर स्थितियों जैसे दुर्घटना, सर्जरी के दौरान रोगी को अतिरिक्त खून की आवश्यकता होती है, यहीं आपके द्वारा किया गया रक्तदान बड़ी भूमिका निभा सकता है। हालांकि चिंताजनक बात ये है कि भारत में हर दिन लगभग 12,000 मरीज समय पर रक्त न मिल पाने के कारण मर जाते हैं। देश में रक्तदान के डिमांड और सप्लाई में काफी अंतर है।स्वास्थ्य विशेषज्ञ कहते हैं, 18 से 65 वर्ष की आयु का स्वस्थ व्यक्ति (महिला या पुरुष) जिसका वजन कम से कम 50 किलोग्राम हो और हीमोग्लोबिन लेवल कम से कम 12.5-13.0 की बीच हो, वह स्वेच्छा से रक्तदान कर सकता है।अब सवाल ये है कि क्या समलैंगिकों, ट्रांसजेंडर और यौनकर्मी भी खून का दान कर सकते हैं? तो इसका जवाब है नहीं। गुरुवार (12 मार्च 2026) को केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि तमाम समीक्षाओं के बाद समलैंगिक, ट्रांसजेंडर और यौनकर्मियों पर रक्तदान को लेकर प्रतिबंध बरकरार रखा गया है। आखिर ये लोग रक्तदान क्यों नहीं कर सकते, आइए इस बारे में जान लेते हैं।
रक्तदान को लेकर दिशानिर्देश में ट्रांसजेंडर-समलैंगिकों पर है रोक
केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि ट्रांसजेंडर, गे पुरुषों और यौनकर्मी द्वारा रक्तदान पर लगे प्रतिबंध को जारी रखने का फैसला किया गया है। यह फैसला विशेषज्ञों द्वारा कोर्ट के कहने पर पहले के निर्णय की समीक्षा करने के बाद लिया गया है। भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति विपुला पंचोली की एक पीठ, उन रिट याचिकाओं पर सुनवाई कर रही थी, जिनमें केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के तत्वावधान में नेशनल ब्लड ट्रांसफ्यूजन काउंसिल और राष्ट्रीय एड्स नियंत्रण संगठन द्वारा जारी "रक्त दाता चयन और रक्त दाता रेफरल के दिशानिर्देश, 2017" को चुनौती दी गई थी।इस दिशानिर्देशों के खंड 12 और 51 में ट्रांसजेंडर व्यक्तियों, समलैंगिक पुरुषों और महिला यौनकर्मियों को एचआईवी संक्रमण के उच्च जोखिम वाले समूह का माना गया है।खतरे को देखते हुए ऐसे लोगों के ब्लड डोनेशन पर रोक लगाई गई है।पिछले साल, कोर्ट ने केंद्र से इस बैन पर फिर से विचार करने को कहा था।
कोर्ट ने कहा, एक प्रतिशत भी रिस्क नहीं ले सकते
गुरुवार को इस मामले पर फिर से सुनवाई हुई। भारत की अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल (एएसजी) ऐश्वर्या भाटी ने कोर्ट को कहा, विशेषज्ञों ने इस बात को दोहराया है कि व्यापक जनहित में यह प्रतिबंध जरूरी है।एएसजी भाटी ने कहा, विशेषज्ञों ने इस पर फिर से विचार किया है और उनकी राय है कि अगर इस बैन में ढील दी जाती है, तो यह रक्त प्राप्तकर्ता के लिए नुकसानदायक हो सकता है। याचिकाकर्ताओं की ओर से सीनियर एडवोकेट जयना कोठारी ने कहा कि यह फैसला किसी व्यक्ति को सिर्फ उसकी सेक्शुअलिटी और जेंडर पहचान के आधार पर निशाना बना रहा था।हालांकि सरकार ने इसे भेदभाव नहीं बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य और मरीजों की सुरक्षा के लिए जरूरी बताया है।सीजेआई ने केंद्र के फैसले में दखल देने से मना कर दिया। उन्होंने कहा, हमें कोई एक ठोस वजह बताइए कि हम कोई निर्देश क्यों जारी करें। लाखों-करोड़ों ऐसे गरीब लोग हैं, जिन्हें मुफ्त में खून मिलता है। वे प्राइवेट अस्पतालों का खर्च नहीं उठा सकते। यह समाज का गरीब तबका ही है, जो इसी खून के सहारे जिंदा है। इन गरीब लोगों को, अगर संक्रमण का सिर्फ एक प्रतिशत भी खतरा हो, तो भी उन्हें इसका शिकार क्यों बनना चाहिए?
भारत में ब्लड डोनेशन को बढ़ावा देने की जरूरत
तमाम बहस के इतर, देश में रक्त की जितनी मांग है उसकी तुलना में रक्तदान की दर काफी कम है। कोरोना के दौरान और इसके बाद के समय में ये खाई और बड़ी हो गई है। देश में हर दो सेकेंड में किसी न किसी व्यक्ति के ब्लड की आवश्यकता होती है।भारत में हर साल 1.4 करोड़ यूनिट रक्त की आवश्यकता है।हर साल अनुमानित तौर पर 30-40 लाख यूनिट खून की कमी रह जाती है।देश में रक्तदान को बढ़ावा देने के लिए नियमित रूप से कई कैंप चलाए जाते रहे हैं हालांकि लोगों में अज्ञानता, जागरूकता की कमी और सही जानकारी न होने के कारण डोनेशन के लिए लोग आगे नहीं आते। स्वास्थ्य विशेषज्ञ कहते हैं, ब्लड डोनेशन सिर्फ सामाजिक कल्याण का विषय ही नहीं है, इससे रक्तदाता को भी कई तरह के स्वास्थ्य लाभ होते हैं।
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