पड़ोसी राजनीति के नतीजों में भारत की रणनीतिक उम्मीद
चुनाव में बांग्लादेश आवामी लीग (बीएएल) की अनुपस्थिति और धुरविरोधी रही बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) की जीत के बावजूद भारत को पड़ोसी देश से संबंध में सुधार की उम्मीद है। भारत की इस उम्मीद का कारण चुनाव के बाद पड़ोसी देश में बदली राजनीतिक परिस्थितियां हैं। मसलन भारत विरोधी और मजहबी कट्टरपंथी जमात एक इस्लामी के छात्र संगठनों के दल समेत 11 दलों के गठंबधन को मिली असफलता के बाद पड़ोसी देश में पहली बार जमीनी स्तर पर बीएनपी बनाम जमात की जंग की शुरुआत है। इससे पहले भारत संयुक्त रूप से बीएनपी और जमात के निशाने पर रहा है।सरकारी सूत्र के मुताबिक, पड़ोसी देश के आम चुनाव में कई ऐसी घटना हुई हैं, जिससे दोनों देशों के द्विपक्षीय संबंध में धीरे-धीरे सुधार के संकेत मिले हैं। इसमें सबसे अहम पड़ोसी देश में छात्र आंदोलन के कारण मचे भारी उथल पुथल के बावजूद मतदान में आई करीब 30 फीसदी की गिरावट है। गिरावट इस बात का संकेत है कि छात्र आंदोलन के बाद अंतरिम सरकार की अदूरदर्शी नीतियों-व्यवहार के कारण बांग्लादेश के बाजार में आए संकट और कानून व्यवस्था की स्थिति से एक बड़ा तबका नाखुश है।
भारत विरोधी विचार को नहीं मिला समर्थन
नतीजे यह भी बताते हैं कि भले ही आम चुनाव से पहले जमात और छात्रों के संगठनों ने भारत विरोधी भावनाएं भड़काई। इसी बहाने छात्र संगठनों की नेशनल सिटीजन पार्टी (एनसीपी) ने जमात से गठबंधन कर अपनी सियासी जड़ें मजबूत करने की याोजना बनाई। इनके 11 दलों के गठबंधन के चुनाव प्रचार के केंद्र में भारत विरोध था। इसमें पूर्व पीएम शेख हसीना को भारत में मिला राजनयिक संरक्षण मुख्य था। बावजूद इसके जमात ने भले ही अब तक का सबसे एतिहासिक प्रदर्शन किया, मगर उसका गठबंधन बीएनपी के प्रदर्शन के सामने कहीं नहीं टिका। एनसीपी को तो महज छह सीटें मिली।
व्यापार में छाए संकट को दूर करना चुनौती
सूत्र के मुताबिक, यह सच है कि बीएनपी के सत्ता में रहते हमेशा भारत और बांग्लादेश का तनाव चरम पर पहुंचा। हालांकि इस बार स्थिति दूसरी है। पहली बार है जब जमात वहां भारत विरोधी भावनाओं का प्रतिनिधित्व ही नहीं कर रहा, बल्कि इस मामले में बीएनपी के खिलाफ सड़क पर आंदोलन कर रहा है। नई सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती घरेलू मोर्चे पर मंदी और व्यापार के क्षेत्र में छाए संकट को दूर करने की होगी। ऐसा नहीं करने पर न सिर्फ सरकार के खिलाफ असंतोष बढ़ेगा, बल्कि जमात लगातार हावी होने की कोशिश करेगी।
बीएएल का आधार कायम
कम मतदान का एक अर्थ यह भी है कि बीएएल पर प्रतिबंध के कारण उसके समर्थक मतदाता मतदान के प्र्रति उदासीन रहे। ठीक उसी तरह जैसे 2024 के आम चुनाव में बीएनपी के बहिष्कार के कारण उसके मतदाता मतदान से दूर रहे थे। यही कारण है कि दो साल के अंतर पर हुए दो चुनाव में मतदान में भारी गिरावट दर्ज किया गया।
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