13 या 14 जनवरी... कब है षटतिला एकादशी व्रत? तिल का 6 तरह से करें उपयोग, जानें पूजा विधि और पारण का समय
माघ मास के कृष्ण पक्ष एकादशी तिथि को षटतिला एकादशी कहा जाता है और यह जनवरी मास की पहली एकादशी है. शास्त्रों में इसका विशेष पुण्य बताया गया है. पद्मपुराण एवं विष्णुधर्मोत्तर पुराण के अनुसार, एकादशी का व्रत पापों के नाश और दरिद्रता दूर करने वाला माना गया है. इस एकादशी व्रत में तिल का दान, तिल का प्रसाद और तिल का सेवन किया जाता है. लेकिन इस बार एकादशी तिथि को लेकर हर जगह कन्फ्यूजन की स्थिति बनी हुई है, कुछ जगह बताया जा रहा है कि एकादशी तिथि 13 जनवरी को है तो कुछ 14 जनवरी बोल रहे हैं. आइए पंचांग के माध्यम से जानते हैं इस बार षटतिला एकादशी का व्रत कब किया जाएगा…
कब है षटतिला एकादशी व्रत?
एकादशी तिथि का प्रारंभ – 13 जनवरी, दोपहर 3 बजकर 18 मिनट से
एकादशी तिथि का समापन – 14 जनवरी, शाम 5 बजकर 52 मिनट तक
ऐसे में उदिया तिथि को मानते हैं षटतिला एकादशी का व्रत 14 जनवरी दिन बुधवार को किया जाएगा. इस बार षटतिला एकादशी के दिन ही सूर्य मकर राशि में प्रवेश कर रहे हैं. साथ ही इस बार षटतिला एकादशी पर सर्वार्थ सिद्धि योग और अमृत सिद्धि योग जैसे महायोग बन रहे हैं.
पारण का समय: 15 जनवरी, सुबह 7 बजे से लेकर 9 बजकर 30 मिनट तक.
षटतिला एकादशी का महत्व
एकादशी तिथि का व्रत भगवान विष्णु को अत्यंत प्रिय माना जाता है और इस व्रत को करने से पर्सनल व प्रफेशनल लाइफ में चल रही परेशानियों से मुक्ति मिलेगी. शास्त्रों के अनुसार इस व्रत से पूर्व जन्मों के पाप, ऋण और दरिद्रता का क्षय होता है. साथ ही जो व्यक्ति श्रद्धा से षटतिला एकादशी का व्रत करता है, उसे स्वर्ग लोक की प्राप्ति और अंततः मोक्ष का मार्ग प्रशस्त होता है. मान्यता है कि षटतिला एकादशी के दिन पवित्र नदियों में स्नान कर तर्पण करने और तिल का दान करने का विशेष महत्व बताया गया
6 प्रकार से तिल का प्रयोग करने का विधान
जैसे कि इस एकादशी के नाम में षट अर्थ छह और तिला का अर्थ तिल. इस एकादशी में तिल (तिलहन) का छह प्रकार से प्रयोग करने का विधान है, इसलिए इसे षटतिला कहा गया है. इस व्रत के दिन तिल से स्नान, तिल का उबटन, तिल का हवन, तिल का दान, तिल का भोजन और तिल का उपयोग जल में मिलाकर पितृ तर्पण.
षटतिला एकादशी पूजा विधि
षटतिला एकादशी के दिन ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान व ध्यान से निवृत्त होकर हाथ में अक्षत लेकर व्रत का संकल्प करें. इस दिन पीले वस्त्र पहनकर भगवान विष्णु की पूजा करें. इसके बाद चौकी बिछाएं और उस पर भी पीला कपड़ा बिछाएं. इसके बाद भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की मूर्ति या तस्वीर स्थापित करें. फिर तुलसी दल, चंदन, अक्षत, फल, तिल, फूल, वस्त्र, तिल से बना भोग आदि पूजा से संबंधित चीजें अर्पित करें. इसके बाद विष्णु सहस्त्रनाम और एकादशी व्रत कथा का पाठ करें. इसके बाद घी के दीपक से भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की आरती करें. फिर पूरे दिन फलहार रहें और दान भी अवश्य करें. शाम के समय भी भगवान की आरती करें और रात्रि जागरण करें. इसके बाद अगले दिन शुभ मुहूर्त में व्रत का पारण करें.
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