दर्शन के बाद मंदिर की सीढ़ी पर क्यों बैठना चाहिए? जानें इस प्राचीन परंपरा का महत्व
आपने बहुत से लोगों को देखा है कि वे दर्शन करने के बाद मंदिर की पैड़ी या सीढ़ी पर कुछ समय के लिए बैठ जाते हैं और फिर चले जाते हैं. लेकिन आज भी हम में से बहुत से ऐसे लोग हैं, जिनको इस परंपरा के पीछे की परंपार के बारे में जानकारी नहीं है. मंदिर की पैड़ी या सीढ़ी पर बैठना सिर्फ आराम करने का जरिया नहीं, बल्कि इसके पीछे एक खास परंपरा और उद्देश्य छिपा है. आजकल लोग मंदिर की पैड़ी पर बैठकर अपने घर, व्यापार या राजनीति की बातें करने लगते हैं, लेकिन प्राचीन समय में यह पैड़ी शांति, मंत्र और ध्यान का स्थान था. सीढ़ियों पर कुछ समय के लिए बैठकर मंत्र जप भी किया जाता है, जिससे जप करके पूजा संपूर्ण मानी जाती है. आइए जानते हैं दर्शन के बाद मंदिर की सीढ़ियों पर क्यों बैठना चाहिए…
मंदिर की सीढ़ियों पर ना करें ऐसी बातें
आजकल लोग मंदिर की सीढ़ियों पर बैठकर घर, राजनीति, धर्म संबंधित मामलों में बातचीत करते हैं लेकिन सीढ़ियों पर बैठकर ऐसा नहीं करना चाहिए. दर्शन के बाद मंदिर की सीढ़ियों पर बैठना एक प्राचीन परंपरा है. शास्त्रों में बताया गया है कि जब भी हम किसी मंदिर में दर्शन करते हैं, तो बाहर आकर थोड़ी देर पैड़ी पर बैठकर भगवान का ध्यान करना चाहिए.
सीढ़ियों पर बैठकर मंत्र का करें जप
मंदिर की सीढ़ी पर बैठते ही एक विशेष श्लोक ‘अनायासेन मरणम्, बिना देन्येन जीवनम्. देहान्त तव सानिध्यम्, देहि में परमेश्वरम्.’ का पाठ करना चाहिए. इसका अर्थ है कि हमारी मृत्यु बिना किसी तकलीफ के हो, हम बीमार होकर या परेशान होकर न मरें. साथ ही जीवन ऐसा हो कि हमें किसी पर आश्रित न रहना पड़े, अपने बलबूते पर जीवन व्यतीत करें. जब भी मृत्यु हो, भगवान के सामने हमारे प्राण जाएं और भगवान का आशीर्वाद प्राप्त हो.
इस श्लोक में यह संदेश है कि हमें सांसारिक वस्तुओं के लिए याचना नहीं करनी चाहिए. घर, धन, नौकरी, पुत्र-पुत्री जैसी चीजें भगवान अपनी कृपा से देते हैं. प्रार्थना का मतलब निवेदन और विशेष अनुरोध है, जबकि याचना सांसारिक इच्छाओं के लिए होती है.
मंदिर की सीढ़ियों पर बैठकर करें ये काम
दर्शन करते समय आंखें खुली रखनी चाहिए और भगवान के स्वरूप, चरण, मुखारविंद और श्रृंगार का पूरा आनंद लेना चाहिए. आंखें बंद करना गलत है, क्योंकि हम दर्शन करने आए हैं. लेकिन बाहर आने के बाद, पैड़ी पर बैठकर आंखें बंद करके भगवान का ध्यान करना चाहिए और ऊपर बताए गए श्लोक का पाठ करना चाहिए. अगर ध्यान करते समय भगवान का स्वरूप ध्यान में नहीं आता, तो फिर से मंदिर जाकर दर्शन करें और फिर पैड़ी पर बैठकर ध्यान और श्लोक का पाठ करें. यह प्रथा हमारे शास्त्रों और बुजुर्गों की परंपरा में बताई गई है. इसका उद्देश्य हमारे जीवन में स्वास्थ्य, लंबी उम्र और मानसिक शांति सुनिश्चित करना है. मंदिर में नेत्र खुले और बाहर बैठकर नेत्र बंद करके ध्यान करना हमारी श्रद्धा, ध्यान और भक्ति का प्रतीक है.
महाराष्ट्र में दर्दनाक हादसा: तेज रफ्तार ट्रक ने पिकअप को मारी टक्कर, छह की मौत
क्रूरता की हद: फोटोशूट के लिए रंगे हाथी की मौत, विदेशी इन्फ्लुएंसर पर होगी कार्रवाई
आस्था का महोत्सव: राम जन्मभूमि हनुमान मंदिर में ध्वजारोहण, खास मेहमानों को निमंत्रण
RTE प्रवेश प्रक्रिया शुरू: पोर्टल पर आज जारी होगी स्कूल आवंटन सूची
केसरिया महल में बाबा रणजीत के दर्शन: इंदौर में जन्मोत्सव पर उमड़ा आस्था का सैलाब
Kerala चुनाव 2026: Revanth Reddy का बड़ा आरोप, BJP–CPI(M) के बीच ‘सीक्रेट डील’
बैंकिंग सेक्टर में हड़कंप: RBI ने 14 बैंकों को दंडित किया, एक बैंक का लाइसेंस रद्द
डिजिटल जनगणना का आगाज़: पीएम मोदी और राष्ट्रपति मुर्मू ने लिया स्व-गणना में हिस्सा
योगेश्वर रूप में जीवन का दर्शन देते हैं भगवान श्रीकृष्ण
राशिफल 2 अप्रैल 2026: ये राशि पाएंगी लाभ, ये राशि होंगे मुश्किलों का सामना
पीएम आवास योजना से बना ग्वालिन के सपनों का आशियाना
मध्यप्रदेश पुलिस की वाहन चोरों पर प्रभावी कार्यवाही