सिनेमा में जातिवाद: 'धड़क 2' से पहले भी इन फिल्मों ने झकझोरा समाज
मुंबई : भारत में जाति व्यवस्था एक जटिल और संवेदनशील विषय रहा है, जिसे सिनेमा के जरिए बार-बार दर्शाया गया है। हाल ही में रिलीज हुई 'धड़क 2' ने इस बहस को एक बार फिर जिंदा कर दिया है। लेकिन इसके अलावा भी कई फिल्में हैं जिन्होंने इस मुद्दे को बड़ी गंभीरता और संवेदनशीलता से पर्दे पर उतारा है। आइए एक नजर डालते हैं उन फिल्मों पर जिन्होंने समाज में गहरी छाप छोड़ी।
सैराट
रिलीज वर्ष: 2016
स्टारकास्ट: रिंकू राजगुरु, आकाश ठोसर
निर्देशन: नागराज मंजुले
मराठी सिनेमा की ये ब्लॉकबस्टर फिल्म एक लोअर-कास्ट लड़के और अपर-कास्ट लड़की की प्रेम कहानी है, जो समाज की कट्टर सोच और पारिवारिक हिंसा के कारण त्रासदी में बदल जाती है। नागराज मंजुले ने सैराट के जरिए ये दिखाया कि समाज प्यार को तब तक स्वीकार नहीं करता जब तक वो जातिगत सीमाओं के भीतर न हो। यह फिल्म आज भी जाति आधारित फिल्मों की मिसाल मानी जाती है।
फैंड्री
रिलीज वर्ष: 2013
स्टारकास्ट: सोमनाथ अवघड़े
निर्देशन: नागराज मंजुले
‘फैंड्री’ एक दलित किशोर की कहानी है जो अपनी ही कक्षा की एक ऊंची जाति की लड़की से प्यार करता है। ये फिल्म बचपन की मासूमियत और समाज की कट्टर सोच के बीच टकराव को दर्शाती है। मंजुले ने अपने डेब्यू निर्देशन में ही जातिगत भेदभाव की गहराई को बेहद प्रभावी ढंग से पेश किया है।
सुपर 30
रिलीज वर्ष: 2019
स्टारकास्ट: ऋतिक रोशन, मृणाल ठाकुर
निर्देशन: विकास बहल
ये फिल्म बिहार के फेमस शिक्षक आनंद कुमार की जिंदगी पर बेस्ड है, जो वंचित वर्ग के बच्चों को आईआईटी प्रवेश परीक्षा के लिए मुफ्त में तैयार करते हैं। हालांकि फिल्म में ऋतिक रोशन की कास्टिंग को लेकर थोड़ा विवाद हुआ था, लेकिन इसकी कहानी समाज में शिक्षा के जरिए आने वाले बदलाव की ताकत को दिखाती है। जाति का जिक्र सीधे तौर पर कम है, पर सामाजिक वर्गभेद साफ नजर आता है।
मांझी: द माउंटेन मैन
रिलीज वर्ष: 2015
स्टारकास्ट: नवाज़ुद्दीन सिद्दीकी, राधिका आप्टे
निर्देशन: केतन मेहता
ये फिल्म दशरथ मांझी की सच्ची कहानी पर आधारित है, जिन्होंने अपनी पत्नी की मौत के बाद अकेले पहाड़ काटकर सड़क बना डाली। ये सिर्फ संघर्ष की नहीं, बल्कि एक दलित व्यक्ति की दृढ़ इच्छाशक्ति और सामाजिक व्यवस्था के खिलाफ विद्रोह की कहानी है। नवाज़ुद्दीन की दमदार एक्टिंग ने इस किरदार को जीवंत कर दिया।
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